आज

March 3, 2014

हर मायूस  आँखों को 

आज थोड़ी सी आशा मिल जाये 
थक कर लौटते कदमो को 
थोडा ही सही हौंसला मिल जाये 
 
हर एक डूबते सपने को 
तिनके का ही सही सहारा मिल जाये 
हर अंधेरी रह को 
ढलते सूरज का सही, कुछ और उजाला मिल जाये 
 
धूप में चलते हर राही  को 
थोड़ी ही सही, छाया  मिल जाये 
लहरों से लड़ती हर कश्ती को 
दूर ही सही, किनारा मिल जाये 
 
बरसों से राह तकती आँखों का 
मुश्किल से सही, इंतज़ार का पल कट जाये 
हर रास्ते के भटके को 
थोड़े ही सही, कदमो के कुछ निशां  मिल जाये 
 
काश की  बढ़ने की चाह में 
आज किसी अपने का साथ न छूटे 
हाँ थोड़ी नाज़ुक ही सही पर
आज उम्मीद की कोई डोर न टूटे 

 

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One Response to “आज”

  1. Dinesh Gupta Says:

    bahut hi achchhi poem likhi hai beta. Keep it up.
    mumma pad nahin pai hein abhi tak, University se aate hi padhata hun unhen.

    Papa


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